बेनाम सा ये दरद, ठहर क्यु नही जाता..
जो बीत गया हैं, वो गुजर क्यू नही जाता...
सब कुछ तो हैं, क्या दुदाती हैं ये निगाहे
क्या बात हैं, में वक्त पे घर क्यु नही जाता..
वो एक चेहरा तो नही सारे जहा में...
जो दूर हैं वो दिल से उतर क्यो नही जाता...
देखता हू में अपनी ही उलझी हुई, राहों का तमाशा
जाते हैं सब जिधर, मैं उधर क्यो नही जाता
वो नाम ना कब से, ना चेहरा ना बदन हैं..
वो खवाब हैं तो बिखर क्यो नही जाता....
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Monday, 25 February 2008
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